शनिवार, 21 जनवरी 2012

चिट्ठियों को याद करते हुए...

चिट्ठी लिखे हुए कितना वक़्त हो गया? दौड़भाग की ज़िंदग़ी और थ्री जी के ज़माने में इस सवाल की प्रासंगिकता डिबेट का विषय हो सकती है, लेकिन अचानक पूछ लिया जाए तो आदमी ठहरकर सोचेगा ज़रूर। आदरणीय अमुक जी, सानंद होंगे... यहां सब कुशल-मंगल है... आपका पत्र मिला... इन संवादों से दो-चार हुए अरसा हो गया। हिंदी के परिवार से चिट्ठियां और पोस्टकार्ड जिस तेजी से गायब हुए हैं, उसी तेजी से संवाद की भाषा बदली है। हिंदी की यात्रा परिवर्तनकारी पड़ावों से भरी रही है। ये बदलाव केवल बाहरी शब्दों को अपनाने तक ही सिमटकर नहीं रहे, तकनीक से सामंजस्य बैठाने और शैलीगत प्रयोगों में भी बार-बार परिलक्षित होते रहे।

जिन अंतर्देशीय चिट्ठियों और पोस्टकार्डों को इंटरनेट और मोबाइल ने अर्थहीन बना दिया है, उन्हें लिखे जाने के अपने तौर-तरीके थे। जिन्हें समय के साथ आई नई प्रवृत्तियों ने रिप्लेस कर दिया। शुरुआत में बृहतर परिप्रेक्ष्य में -मेल का उपयोग निजी दफ्तरों के ऑफिशियल काम-काज के लिए ही किया जाता था। भारतीय मध्यवर्ग तब इंटरनेट से सामंजस्य बैठाने की कोशिश में था और -मेल अकाउंट वाले लोग एक स्तर तक विकसित और बुद्धिजीवी समझे जाते थे। बाद में निजी संपर्कों के लिए भी -मेल का प्रयोग होने लगा। एक दौर ऐसा भी आया जब लोगों ने सिर्फ नौकरी पाने के लिए -मेल अकाउंट बनाया। सीवी का आदान-प्रदान मेल जगत की बड़ी हरकत हो गई। प्रोफेशनल औरकट-टू-कटसंवाद के फॉर्मेट ने खूब ज़ोर पकड़ा। फिर निजी संवाद के लिए अलग से सोशल नेटवर्किंग साइट्स आईं जिन्होंने भाषा के गठे-गठाए प्रतिमान तोड़ दिए। मोबाइल नेटवर्क से संदेश भेजना चुटकियों का काम हो गया।एसएमस लैंग्वेजने ऐसा ज़ोर पकड़ा कि अंग्रेज़ी और हिंदी जल्दबाज़ी की भाषाएं हो गईं। तकनीक बदली। भाषा की ज़रूरतें बदली। और भी कई वजहों से भाषा में बदलाव आए। समय के साथ हुए सांस्कृतिक परिवर्तनों का संवाद की भाषा पर गहरा असर पड़ा।

लेकिन इन बदलावों के बीच चिट्ठियां याद किए जाने की सबसे बड़ी वजह रखती हैं। चिट्ठियां आम आदमी का साहित्य है। उसके दैनिक जीवन के सुख-दुख के किस्सों और सूचनाओं से भरा। मुझे याद है स्कूल में एक लड़के ने डॉ. कलाम को एक पोस्टकार्ड लिखा था। उस का जवाब गया तो उत्साहवश हमने भी पोस्टकार्ड लिख दिया। जवाब नहीं आया तो तो बेचैनी बढ़ी और कुल चार पोस्टकार्ड लिख मारे। जवाब तो ख़ैर नहीं आया अलबत्ता चार पोस्टकार्ट लिखने के बाद कॉन्फिडेंस ज़रूर गया। आज से क़रीब 12-13 साल पहले ननिहाल से हमारे यहां अंतर्देशीय चिट्ठियों का आना आम बात थी। कई बार उनका जवाब मुझसे लिखवाया जाता। मां चिट्ठी के विशेषज्ञ की तरह बोलतीं, मैं लिखता। शुरुआत आदरणीय मामा जी, सादर चरण स्पर्शजैसे शब्दों से होती थी। आज मामाजी को दिन भर में पचास बार गुडमॉर्निंग-गुडनाइट वाला एसएमएस भेजते हैं। एसएमएस वाउचर आ गए हैं। सस्ता है। फास्ट है। ईको फ्रेंडली है। चिट्ठियां तीनों ही मोर्चों पर मार खाती हैं। एक तो डाक-टिकट का खर्चा, फिर पोस्ट ऑफिसों का सरकारी ट्रीटमेंट। कई दिन लग जाते थे। और काग़ज़ की बर्बादी होती थी सो अलग। इसलिए चिट्ठियां अब प्रासंगिक नहीं रहीं। व्यावहारिक रूप से इस सिस्टम में मिसफिटहो गई हैं। पर यही बात चिट्ठियों की भाषा के संबंध में कहते हुए मैं हिचकूंगा। चिट्ठियों की भाषा को अब भी सहेजकर रखा जा सकता है, रखा जाना चाहिए। चिट्ठी पढ़ते हुए लगता था कि लिखने वाला सामने बैठकर बतिया रहा है। फिर चिट्ठी की खुशबू को किससे रिप्लेस करेंगे। प्रेम-संबंधों की प्रगाढ़ता का साक्ष्य हुआ करती थी चिट्ठियां। कभी हल्दी-मसालों की महक होती तो कभी गुलाब वाले इत्र की महीन-सी खुशबू। चिट्ठी लिखते वक्त आंसू टपकने से फैल चुके अक्षर होते थे। कई बार जान-बूझकर कुछ लाइनें इस तरह लिखकर काट दी जाती थीं, कि पढ़ने वाला पढ़ ले और यह भी समझ जाए कि वह सीधे-सीधे नहीं कहना चाहा था। कई दोस्त बताते हैं कि मां की चिट्ठी पढ़कर भीगी आंखों और कांपते हाथों की छवि आंखों के आगे बनती थी। दुर्भाग्य कि उस सौंधी सी महक वाली स्याही में कलम डुबोकर -मेल्स नहीं लिखे जा सकते। स्याही की महक बिल्कुल उसके रंग जैसी नीली थी। आंखें बंद हों तब भी पता लग जाता था कि नीली स्याही है।

सामाजिक बंधनों की मजबूरी है कि एसएमएस संवाद का सहज माध्यम लगने लगा है। लेकिन एसएमएस की भाषा से न जाने क्यों कभी प्रेम नहीं हुआ। फौरी तौर पर देखने-समझने से लगता है कि मोबाइल ने भाषा में नए प्रयोगों के लिए खुला आकाश मुहैया कराया है। पर ये नए प्रयोग केवल भाषा के संक्षिप्तीकरण तक ही सीमित रह गए हैं। एसएसएस का मूल विचार ही वर्ण-संख्या पर काम करता है। इसलिए यहां नए प्रयोगों का दायरा सीमित है। वे भाषा के डेमोक्रेटिक होने का केवल भरम देते हैं। और मेल की भाषा तो ऐसी लगती है, जैसे सरकारी दफ्तर का कोई पत्र या निजी कंपनियों के एचआर विभाग का कोई सन्देश। मजाल है कि एक भी भाव शब्दों में लिपटकर चला आए। फटाफट ईमेल से चिट्ठियों के साथ होने वाला इंतजार भी चुक गया है। दो पल में जवाब आ जाता है। यहां लिखने की अपनी मजबूरियां हैं। लेखन-शैली से लेकर शब्दों के चयन तक, तकनीकी बाध्यताएं हैं। चिट्ठियां पढ़कर तो हार्मोन एक्टिव हो जाते थे।

यह सब क्यों लिख रहा हूं, नहीं जानता। लेकिन मेरा आग्रह शुद्धतावादी दृष्टिकोण से अलग है। मैं अंतर्देशीय के ज़माने में उसी तरह लौटने की बात नहीं कर रहा। सिर्फ चिट्ठियों की भाषा के नेचर को लेकर नॉस्टैल्जिक हो रहा हूं। यह मेरा हक भी है। जानता हूं कि बहुत कमज़ोर लेख है। यक़ीनन अतार्किक। लेकिन सच कहता हूं आज तार्किक होना भी नहीं चाहा था। दरख़्वास्त बस इतनी है कि अगर आपने कभी चिट्ठी लिखी हो तो इस नॉस्टैल्जिया में मेरा साथ दें।