मंगलवार, १४ जुलाई २००९

लोकतंत्र को बचा लीजिये जनाब !!



पिछले दिनों कहीं एक चुटकी पढ़ी-

"यह कैसी विडम्बना है,

जो सदन में सबसे कम बोल पाता है,

वही स्पीकर कहलाता है"

पढ़ कर पहले तो मैं मुस्कुराया, फिर काफ़ी देर तक कुछ सोचता रहा...क्या लोकतंत्र की यही विडम्बना है... देश-समाज की प्रत्येक घटना लोकतंत्र को प्रभावित करती है... कहीं ब्लास्ट होता है, किसी की अस्मत लूटी जाती है, कहीं फर्जी एनकाउंटर होता है या किसी की जेब भी काटी जाती है; तो लोकतंत्र के सीने में तीर पहले गड़ जाता है... फिर राजनीति और लोकतंत्र तो सीधे सीधे जुडे हैं… राजनीतिक क्षेत्र से जुड़ा प्रत्येक अनैतिक कृत्य लोकतंत्र का दम घोंटता है, उसे कमज़ोर करता है... पिछले कुछ वर्षों में हुई ज्यादातर छोटी बड़ी घटनाओं ने लोकतंत्र को दुष्प्रभावित ही किया है... कुछ उदाहरण दे दूँ... हालिया लोकसभा चुनावों में नेताओ ने एक दूसरे पर जो व्यक्तिगत और अभद्र टिप्पणियां की, वो लोकतंत्र की प्रगति का द्योतक तो बिल्कुल नहीं है... एक दूसरे की उम्र को लेकर बेतुकी बातें की गईं... अखिलेश दास ने नफीसा अली को लेकर जो कुछ भी कहा, वो अपने आप में अभद्रता की हद थी... अब एक सपाई की याद भी दिला दूँ... नए नए नेता बने संजय दत्त ने एक जनसभा में ये तक कह दिया की जेल में मुझे पुलिस यह कहकर मारती थी, कि तू एक मुसलमान मां का बेटा है... जबकि उनकी बहन प्रिया दत्त इस तरह की किसी भी बात की जानकारी होने से नकारती रहीं... ज़ाहिर है, यह कहकर संजय दत्त ने मुसलामानों की भावनाएं भड़काने की कोशिश की... संजय को इस बात का अंदाजा भी था की उनके इस गैर-जिम्मेदाराना बयान से दंगे भी भड़क सकते थे... ये गुनाह वरुण गाँधी के गुनाह से कतई कम नहीं था, लेकिन मीडिया की कृपा के चलते मुन्ना भाई बच गए... वहीं पिछले दिनों नेताओं पर खूब जूते भी चले...उस से पहले संसद में लाखों रुपये लहराए गए...राज ठाकरे की याद दिलाने की ज़रूरत नहीं... अभी भी वो लोकतंत्र की पूंछ पकड़ कर उसे पीछे खींचने पर उतारू हैं... ये केवल चंद उदाहरण हैं... इनके अलावा अगर उँगलियों पर गिनने बैठें तो ऐसी अनेक छोटी-बड़ी घटनाएं हैं, जिन्होंने जनतंत्र की राह में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से रोड़े अटकाए....

आख़िर ऐसा क्या है, कि राजनेताओं से लोगों का भरोसा उठता जा रहा है... मैं नहीं जानता की 'राजनीति' शब्द कहाँ से व्युत्पन्न हुआ... लेकिन ये कह सकता हूँ की इस शब्द को सबसे पहले जिसने भी प्रयोग किया होगा, आज उसकी आत्मा रो रही होगी... कारण यह कि इस युग के नेताओं ने 'राजनीति' को उसके शाब्दिक अर्थ के रूप में समझा... वास्तव में राजनीति, राज करने की नीति नहीं है.... बल्कि आधुनिक लोकतांत्रिक परिप्रेक्ष्य में इसे 'जननीति', 'समाजनीति' या 'विकासनीति' कहें तो ज़्यादा अच्छा है... मेरे पड़ोस में रहने वाला एक ४ साल का बच्चा पॉलिटिक्स को तुतलाती भाषा में “पोली-एथिक्स” कहता है… वो अबोध बालक अनजाने में ही सही लेकिन वोटसाधक नेताओं को राजनीति के असली मायने बता देता है… राजनीति करना और समस्या से रूबरू होना दोनों अलग-अलग चीज़ें हैं... लेकिन हवा में उड़ने वाले नेता राजनीति करने को ही सेवा का मानदंड मान लेते हैं... और लोकतंत्र की अवनति को बल मिलता है... लोकतंत्र की अवनति के लिए सिर्फ़ नेताओं पर सारा दोष मढ़ना भी ठीक नहीं होगा... हमारे यानी आम जनता के रवैये ने भी लोकतंत्र की जड़ों में मट्ठा डालने का काम किया है... नागरिकता का बेसिक उसूल है की नागरिक और राज्य परस्पर इस प्रकार जुडे हों की नागरिक राज्य के प्रति निष्ठा व्यक्त करते हुए अपने कर्तव्यों का पालन करें, और राज्य उनके हितों की रक्षा की गारंटी ले... हम टैक्स चोरी करते हैं, अपने कर्तव्य नहीं निभाते, अधिकारों का जमकर उपभोग भी करते हैं और अपनी बातों को मनवाने के लिए हिंसक हो जाते हैं... कनाडा में सिक्ख संत की हत्या कर दी गई तो लोगों ने भारत में ही बसों में आग लगाना शुरू कर दिया, ट्रेनें रोक दीं... मुझे समझ नहीं आया कि उनका आन्दोलन आख़िर किसके ख़िलाफ़ था???... भारत सरकार ने तो पहले से ही कनाडा सरकार पर दबाव बनाना शुरू कर दिया था... संत की हत्या में न तो भारत सरकार का दोष था और न ही उन आम लोगों का जिन्हें पूरे आन्दोलन के दौरान अनगिनत दिक्कतों को झेलना पड़ा... जनता ही लोकतंत्र का आधार है... ऐसे में अगर हम ही सकारात्मक और प्रैक्टिकल रुख नही रखेंगे तो नेताओं से ऐसा करने की उम्मीद कैसे की जा सकती है... मानता हूँ कि लोगों की भावनाएं आहत हुईं, लेकिन अगर इतना ही आक्रोश है तो जाइए, कनाडा का टिकट कटाइये, वहां बसों को फूंकिए.... इस तरह से क़ानून व्यवस्था को ताक़ पर रखकर हिंसक विरोध करने वाले लोगों से मुझे कोई सहानुभूति नहीं है... इस तरह की घटनाएं लोकतंत्र के लिए खतरा पैदा करती रही हैं और करती रहेंगी...

लोकतंत्र की गुणवत्ता को सीधे सीधे प्रभावित करती है- विपक्ष की भूमिका.... और हमारे देश में यही सबसे बड़ी समस्या है....देश में विपक्ष की राजनीति हमेशा दुरेच्छा और दुरुद्देश्य से प्रेरित है... मैं भाजपा या कांग्रेस की बात नहीं कर रहा... विपक्ष में कोई भी दल हो, उसने हमेशा सरकार की टांग खींचने का ही काम किया है... हाँ कभी कभी कुछ अपवाद देखने को मिल जाते हैं... सिद्धू की तारीफ़ करना चाहूँगा की उन्होंने रेल बजट को ग्रासरूट का बजट बताया... और आम बजट की खामियां गिनाने में भी पीछे नहीं हटे...

लोकतंत्र की प्रगति में बाधक तत्वों से निपटना आसान नहीं है... हमें ज़मीनी स्तर से शुरुआत करनी होगी... पहले ख़ुद को बदलना होगा... फिर अपने नेताओं को... इस दिशा में ये ज़रूरी है कि सबसे पहले विपक्ष सकारात्मक भूमिका निभाये, सरकार के अच्छे क़दमों का समर्थन करे और वे नीतियाँ जिनसे जनहित बाधित होता हो, उनका विरोध करे और अगर ज़रूरत पड़े तो लोगों के संज्ञान में लाये.... दूसरे, हम अपनी ज़िम्मेदारी समझें, अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक रहे और लोकतंत्र को बढ़ावा मिले इसके लिए सरकार का हाथ बंटाएं... साथ ही रूढिवादिता को राजनीति से दूर रखा जाए, प्रैक्टिकल सोच वाले लोगों को राजनीति में तरज़ीह दी जाए... दकियानूसी लोगों को जनता सबक सिखाये… अगर हम इतना कर सके तो निश्चित रूप से अपने परिवार, अपने समाज, अपने देश और अपने लोकतंत्र को सुरक्षित रख सकेंगे....

2 comments:

Santosh ने कहा…

bahut sundar lekh.....

Palaash ने कहा…

vishay vaakai gambheer hai....acchi samiksha...